Wednesday, April 8, 2009

पुरस्कृत कविता- यादों की किताब

हिंद युग्म के मेरे बारे में कुछ शब्द

नवम्बर माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की दूसरी कविता कवि संजय सेन सागर की है, जिसके माध्यम से कवि ने साहित्य को व्यवसाय समझने वालों पर वार किया गया है। साथ-साथ यह कविता एक सच्चे लेखक की भावनाओं को बयां करने का प्रयत्न करती है। म.प्र. के सागर जिले में पैदा हुए और सागर केन्द्रीय विश्वविधालय में बी.काम. द्वितीय वर्ष के छात्र कवि संजय सेन सागर की यह पहली रचना है, जिसे हिन्द-युग्म पर प्रकाशित किया जा रहा है। कवि को पिछले कुछ सालों से लिखने का शौक लगा है। मीडिया में जाना चाहते हैं, उसी दिशा में प्रयासरत हैं।

यादों की किताब

दिल की तन्हाई जिदंगी की यादों
और ख्वाबों की इबारत से
खामोश रात में लिखी किताब का सुबह सौदा हुआ ।
बिक गये वे सभी सपने जो आँखों में बंद थे ।

लुट गया वो अकेलापन जिसे चुराया था
भीड़ से रह गई तो सिर्फ कुछ दौलत जो मेरे बेकाम की थी ।
सच्चे दिल के खून को
स्याही बनाकर रंगा था
उस किताब के पन्नों को ।

लुटा दी थी हमने सारी खुशियां
और गम उस किताब को सजाने में
अब मेंरे साथ कुछ है तो उस की धुंधली सी यादें।

आसमां सी विशाल भावनाओं,
जमीन की पावन सादगी
और हवा के आवारापन को
बमशक्कत समाया था उस यादों की किताब में।

मगर अब मेरी यादें तन्हाई
और ख्याव टूट चुके है।
आसमां की विशालता, जमीन की सादगी
और हवा का आवारापन समा चुका है सौदागर की जेब में।

बरसात की जिन भीगी रातों में
गर्मी की तन्हाई भरी बातों में और
सर्दी के खमोश कोहरे में।
अपने खून को बर्फ करके लिखी किताब का।
सूरज की पहली किरण के साथ सौदा हुआ।

सूरज के ढलने के साथ ही ढल गई मेरी आत्म शक्ति।
खो गई सोचने की विचार शक्ति।
खो गई वो यादें ख्वाब और तन्हाई।
छोड़ दिया इस दिल ने धड़कना जो धड़कता था
उस यादों की किताब को सोचकर।
बेजान हो गया है यह शरीर खोखला हो गया है
ये दिल जबसे बिकी है वो खामोश रात में लिखी मेरी यादों की किताब

5 comments:

  1. नया मंच बनाया है आप लोगों का सहयोग चाहूँगा

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  2. ढल गयी मेरी आत्म शक्ति---
    सन्जय ,कविता तो अच्छी ही है ,पर कवि कभी निराश नहीं होता ,इन बुराइयों से लडना ही तो कवि कर्म है. कवि की ही सोचने -विचारने की शक्ति खो जायेगी ज़रा से आघात से तो आगे कैसे चलोगे,नकारात्मक भावों को कविता में विस्तार करने का मैं हामी नहीं हूं।
    बढिया जा रहे हो ,लिखते रहो..लिखते रहो
    "" न तुम निराश हो कि पूछता नहीं हमॆं कोई,
    न तुम निराश हो कि सूझती न राह अब कोई।""

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  3. बहुत ही बढ़िया और भावपूर्ण काव्य धारा.....

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  4. आसमां सी विशाल भावनाओं,
    जमीन की पावन सादगी
    और हवा के आवारापन को
    बमशक्कत समाया था उस यादों की किताब में।

    bahut achha likha hai aapne...saral shabdo dwara ek achhi rachna

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